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शुक्रवार, 25 मई 2018

रात, नींद और ख्वाब


हर रोज की तरह आज भी 
शाम ढलते ही
रात आयी 
धीरे धीरे
अपनी मुट्ठी बन्द किये
बडी बेसब्री से मिली उससे
कुछ न सूझा
बस गले लगा लिया 
फिर धीरे से 
पास जाकर कान में पूछा 
क्या लाई हो
आज मेरे लिए 
नींद या ख्वाब .........
रात चुप रही 
कुछ भी न बोली
उसकी चुप ने 
मुझे बेचैन कर दिया
मैने कहा -
कुछ तो कहो 
क्या हुआ 
आखिर क्यो हो परेशान 
रास्ते में कुछ हुआ क्या
फिर कोई मिला क्या
अंधेरों का फायदा उठाने वाला
हौले से मेरे कंधे पर हाथ रख
रात कुछ गम्भीरता से बोली
नही कोई मिला तो नही
मगर
मै देख रही हूँ
सो रहे है लोग जागते हुए भी
सो गई है इंसान मेंं इन्सानियत
सो गया है उसका स्वाभिमान
सो गयी है नेक नियत
सो गया है देश समाज के लिये प्रेम
भाग रहे है सब सपनो के पीछे 
सोते सोते

कैसे लाऊं ऐसे मे 
मै नींद और ख्वाब 
गर मैने भी सुला दिया सबको 
तो सुलाना पडेगा ये देश
सदा सदा के लिए 
जहाँ नही होगी गुंजाइश
ख्वाबों की
कि ख्वाब पूरा करने को तो
पडेगा जागना

इसलिए नही लाई कुछ भी
आज तेरे लिए 
चलो आओ मेरे साथ
जगाए सोए लोगो को 
ताकि हो सके सपने पूरे 
उन लोगो के 
जो सो गए हसते हसते 
सदा के लिए 
अपने प्यारे भारत की
सुकून की नींद और ख्वाब के लिए

शनिवार, 12 मई 2018

हर दोपाया आदम नही


नही कहा जा सकता
हर हाड़ मांस वाले
दो हाथो और दो पाये वाले को
इंसान

और भी बहुत कुछ  चाहिये
दो हाथों दो पैरों
पांच इन्द्रियों
और शेष वो सब
जिससे मिल कर बने ढाँचे को
सम्बोधित कर सकती है दुनिया
मानव योनि 
के अलावा

भले ही
मानव योनि में जन्म
होता हो
पूर्व कर्मों का फल
किन्तु मानव रचना को
इंसान कहलाने के लिये
गुजरना होता है
एक सतत प्रकिया से
बनना पड़्ता है वो कमल
जो रखता है
स्वच्छ स्वयं को
कीचड़ मे भी
नही होती प्रभावित रचं मात्र भी
उसकी कोमलता
उसकी सुगंध और
उसके सदगुण

भला कैसे कहा जा सकता है
हाड़ मांस वाले
दोपाये को इंसान
जिसके अंतर्मन में घर बना चुके हो
द्वेषईर्ष्यादंभ
जिसकी सोच में हो कपट
जिसकें कर्म हो अमानवीय
और जिसके हदय में हो छल

वो पुष्प
जो आकार में कमल सा हो 
किन्तु
उपजे हो नुकीले कांटे
आती हो दुर्गंध
पत्थर जैसी हो कठोरता
और
हो अंधेरें सा कालापन
नही कहलायेगा 
कमल
नही चढेगा पूजा में

आकॄति के आधार पर 
नही हो सकती गुणों की माप 
अन्यथा
एक ही कहलाते
देव और दैत्य 

गुरुवार, 3 मई 2018

पलाश का पत्र- पाठ्कों केलिये

आप सभी के साथ अपनी खुशी बाँटते हुये और भी खुशी का अनुभव कर रही हूँ
पलाश आज एक छोटे ही सही किन्तु मुकाम पर पहुच गया, आज अगर उसकी पेज दॄश्य संख्या ६ अंको को और टिपणियों की संख्या ४ अंकों को छू सकी तो यह आप सभी के स्नेह और आशीष का परिणाम है।
मई ०३, २०१० को मैने यह ब्लाग अपनी पहली रचना “जीवन से परे” के साथ शुरु किया था। कैसे धीरे धीरे अपने मन के भावों को टूटे फूटे शब्दों का सहारा ले लिखती गयी और करीब ३०० रचनाओं को पलाश में जोड दिया पता ही नही चला।
मुझे याद आता है जब मेरी पहली रचना को चर्चा मंच पर प्रकाशित करने के सूचनार्थ टिप्पणी आयी थी। ब्लाग पर इस टिप्पणी देख कर मन मे जो आनन्द का उत्सव हुआ था, आज उसे शब्दों में नही व्यक्त कर सकती। इसे एक सुखद संयोग ही कहूंगी कि आज १००० वीं टिप्पणी भी पांच लिकों पर आनन्द पर रचना को सम्मिलित किये जाने की सूचना के साथ आयी। श्वेता सिन्हा जी आपका हार्दिक आभार।
आज का दिन शायद संयोगों का ही दिन है, आज पलाश ने अपने आठ वर्ष पूरे कर लिये।आज मेरे लिये खास इस दिन पर उन सभी बडों को नमन जिन्होने पलाश को अपना आशीर्वाद दिया। सभी ब्लाग मित्रों को धन्यवाद, जो समय समय पर पलाश को अपने अमूल्य सुझाव देते रहे।
आप सभी से इसी तरह चिरकाल तक यूं ही स्नेह एवं आशीष की आकांक्षा के साथ एक बार पुनः पलाश के सुधीपाठकों खास कर विदेशी पाठकों का जो हिन्दी और पलाश के साथ हैं, उन सभी का आभार
"पलाश"

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

जिन्दगी - A easiest thing






दुनिया का सबसे आसान काम 
जानते हैं क्या है
जिन्दगी जीना
आप सोचने लगे न
कि गलत कह रही हूँ
कहाँ आसान है जिन्द्गी जीना
ये परेशानियां खत्म हों
तब तो जिये कोई जिन्दगी
कभी पैसों की तंगी
कभी बीमारियां
कभी नौकरी बचाने की चिंता
कभी भविष्य
इन सबमें ही उलझ जाती है 
जिन्दगी
और तब दोष देते है 
कभी अपनों को
तो कभी अपनी किस्मत को 
मगर नही 
फिर भी कहती हूँ
मेरा यकीन कीजिए 
जिन्दगी जीना 
बिल्कुल मुश्किल नही
हम खामखां ही
बना देते हैं इसे मुश्किल
जरा दो पल के लिये
निश्चिन्त हो जाइये
और सोचिए
क्या जिन्दगी ने कभी 
कुछ भी मांगा आपसे 
खुश होने के लिए 
इक प्यार के सिवाय
नही न
और आखिर क्या चाहिए 
प्यार देने या करने के लिए 
सिर्फ और 
सिर्फ
एक अच्छा मन
और बताइये जरा
क्या चाहिए मन को
सुन्दर बनाने के लिए 
बस कुछ अच्छी आदते 
और भला क्या करना है
अच्छी आदतो के लिए 
कुछ भी तो नही
सिर्फ मन की आवाज 

सुनने के सिवाय
हम खामखां
बना देते हैं
इसे मुश्किल जिन्दगी जीना
बिल्कुल मुश्किल नही
हाँ हमेशा रहती है
जिन्दगी हमारे सामने 
हंसती मुस्कुराती
मगर हम
क्या करते हैं हम
करते रहते है डेकोरेट
जिन्दगी को 
ताकि सुन्दर दिखे
सबसे ज्यादा सुन्दर
खुद की नजरों को नही
औरों की नजरों को
और इस क्म्पटीशन में
जिन्दगी मेरे साथ होते हुये भी
हो जाती है हमसे दूर
करते तो है सब कुछ
जिन्दगी को खुश रखने के लिये
मगर क्या चाहिये जिन्दगी को
एक प्यार के सिवाय
खामखां ही
बना देते हैं इसे मुश्किल
जिन्दगी जीना 
बिल्कुल मुश्किल नही
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