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सोमवार, 11 सितंबर 2017

स्पर्श और स्त्री



स्पर्श
जिसमें निहित है  
निर्मांण की कल्पना
या विनाश का षणयंत्र
बराबर मात्रा में
स्पर्श
एक ऐसा इन्टरफेस
जिसमें इनपुट तो एक ही होता है
मगर बदलते रहते हैं आउट्पुट
कभी बन जाता है भक्ति
तो कभी द्या 
कभी भर जाता है मन
स्नेह के भाव से
कभी जग जाती है 
सुषुप्त प्रेम की तॄष्णा
और कभी
छटपटा जाता है मन
जल विहीन मीन सा
स्पर्श
एक ऐसी शक्ति
जिसमें जीवन भी है
और मॄत्यु जितना भय भी
जो रच सकता है प्रेम का महाकाव्य
या बन सकता है विषैला सर्प
स्पर्श
जो कभी तैरा जाता हैं
अनगिनत सपने
कभी कर देता है
 हौसलों का संचार
थके मन में
कभी बन जाता है
आशीष
और कभी देता है आहट 
किसी अवांछनीय विनाश की
स्पर्श
कभी बन जाता है
विश्वास 
जीवन पर्यन्त साथ निभाने का
कभी दे जाता है 
अहसास
जो कहता है "मै हूँ ना"
तुम बस आगे बढो
स्पर्श
एक ऐसा अक्षररहित शब्द
जो कह देता है
हर वो बात जिसे
कोटि शब्द समूहों के युग्म भी नही कह पाते
स्पर्श 
एक ऐसी पहेली
जिसे सुलझा लेती है
स्त्री
क्षण के न्यूनतम भाग जितने समय में
जान लेती है
स्पर्श करने वाले का
इतिहास
और तय कर देती है
उसका चैरित्रिक भूगोल
निश्चित कर लेती है
दूरी या निकटता
और रच देती है अध्याय
सम्बन्धों की सम्भावना या असम्भावना का

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 14-09-17 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2727 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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